Poetry

dekha kal ....

नन्हे हांथों को जिंदगी का बोझ उठाते देखा कल... जो बचपन होता है बेफिक्री से जीने के लिए, उस बचपन को जिंदगी की जंग लड़ते देखा कल. जिन आँखों मे होती है चमक सुनहरे कल की, उन आँखों मे सपनो की रोटी पकाने की चाह्त को देखा कल. जिन चेहरों पे होनी चाहिए मासूमिय…

man ki raah

आज तक कभी इसकी कभी उसकी सुनी वही किया जो अपनों ने कही समाज की बनाई मर्यादाओं की परवाह करती रही झूठे रीती रवाजों से डरती रही रात की परछाई में खड़े होके किया सुबह का इंतज़ार जाना होगा खुद ही पार ये जान के भी करती रही किसी मांझी का इंतज़ार दूसरों …

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