man ki raah

आज तक कभी इसकी कभी उसकी सुनी
वही किया जो अपनों ने कही

समाज की बनाई मर्यादाओं की परवाह करती रही
झूठे रीती रवाजों से डरती रही

रात की परछाई में खड़े होके किया सुबह का इंतज़ार
जाना होगा खुद ही पार ये जान के भी
करती रही किसी मांझी का इंतज़ार
दूसरों की खुशियों के लिए खुद की इच्छाओं की आहूति देती रही
कभी इसकी कभी उसकी सुनती रही

लेकिन अब ना इसकी ना उसकी सुनूंगी
अब तो बस अपने मन की राह चलूंगी
अब होगी नई सुबह नया सवेरा
अब नहीं होगा मेरे जीवन पे किसी का पहरा
अब नहीं किसी मांझी का इंतज़ार अब तो खुद ही थाम ली है पतवार
अब तो खुद ही जाना है उस पार
जहाँ कर रहा है एक नया सवेरा मेरा इंतज़ार
अब नहीं करनी किसी की परवाह
अब तो चलना है

बस मन की राह .....

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