
सावन में उत्तर प्रदेश में गए जाने वाले लोक गीतों को कजरी कहते है .
कजरी शब्द हिंदी के शब्द कजरा से बना है जिसका अर्थ काजल या कला होता है . ये उत्तर प्रदेश और बिहार में गाया जाता है .
यों तो ये पूरे बिहार और उत्तर प्रदेश में गाया जाता है लेकिन मिर्ज़ापुर को इसका उद्गम स्थल मानते है वहां इसके के बारे में एक लोक कथा भी प्रचलित है .ये कथा है कजली की
कजली का पति शहर रोजगार की तलाश में गया है ,सावन आता है और कजली को अपने पति की याद सताती है .काले बदल जब बरसते है तो
कजली के आँखों से भी आंसुओं की बरसात होती है जब उसकी सारी सहेलीया अपने अपने पति के साथ झूले पे झूलती है तो कजली के मन से आह सी निकलती है
इसी आह ने गीत का रूप ले लिया कजमलमाइ के चरणों में सेर रख के जो गीत उसने बुने वही कजरी के नाम से प्रशिध हुए.
इसके दो रूप प्रचलति है एक तो जो पारंपरिक कलाकारों द्वारा मंच पे प्रस्तुत किया जाता है और दूसरा जिसे महिलाये झूंड बना कर
अर्धवृताकार घेरे में नाचते हुए गाती है इस दुसरे प्रकार को " ढन्मुनिया कजरी" कहते है
अमूमन ये विरह गीत ही होते है लेकिन इनमे और भी कई तरह की चीजें देखने को मिलती है
जैसे नन्द भौजी की छेड़
कैसे खेलन जेबू सावन में कजरिया बदरिया घिर आई ननदी
तू तो ज़ात हो अकेली .....
छैला रोक लिहे तोहरो डगरिया बदरिया घिर आई ननदी
या फिर परदेश से वापस आये पिया से प्रियतमा की फरमाइश
पिया मेंहदी ले आ द मोती झील से जाके साईकिल से ना
या फिर
हमके सावन में झुलनी गढ़ई द पिया जिया बह्लाई द पिया ना
हमारी संस्कृति को जिन्दा रखने में इन लोक गीतों को बहुत योगदान है
अज भी ये हमे ये अपने गाँव की मिटटी की याद दिलाती है और हमे उनसे जोडती है
उपरोक्त लिंक पे क्लिक करके आप भोजपुरी कजरी सुन सकते है .
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